
इस संबंध में सिद्धांत फास्ट न्यूज़ के जिला संवाददाता विनय तिवारी ने आचार्य पंडित दशरथ दुबे से खास बातचीत किया आचार्य जी ने बताया शास्त्रों के अनुसार वैसे तो गया जी में पिंडदान रुपी श्राद्ध हर महीने करना श्रेयस्कर होता है लेकिन पितरों की मुक्ति के लिए गया जी में श्राद्ध केवल पितृ पक्ष और खरमास महीने में करने का विधान शास्त्रों में है
पितरों की मुक्ति (तरण) और उनकी शांति के लिए श्राद्ध और पिंडदान मुख्य रूप से आश्विन मास के कृष्ण पक्ष (पितृ पक्ष) में किया जाता है। अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार यह अवधि आमतौर पर सितंबर या अक्टूबर के महीने में आती है।
श्राद्ध करने के मुख्य और विशिष्ट नियम इस प्रकार हैं:
पितृ पक्ष (सामूहिक श्राद्ध): भाद्रपद मास की पूर्णिमा से लेकर आश्विन मास की अमावस्या (महालय) तक के 16 दिन पितरों को समर्पित होते हैं। इस दौरान सभी पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान किया जाता है।
तिथि के अनुसार श्राद्ध: पितृ पक्ष में जिस तिथि (जैसे- पंचमी, एकादशी, द्वादशी आदि) को आपके परिजन का निधन हुआ हो, उसी विशिष्ट तिथि पर उनका श्राद्ध करना सबसे उत्तम माना जाता है।
सर्वपितृ अमावस्या: यदि आपको अपने पितरों की देहांत की तिथि याद नहीं है, तो आप पितृ पक्ष के अंतिम दिन यानी आश्विन अमावस्या पर सभी पितरों का एक साथ श्राद्ध और तर्पण कर सकते हैं।
