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पूजा पाठ यज्ञ अनुष्ठान में विद्वानों को अपने द्वारा बनाए गए मंत्र और आरती का प्रयोग नहीं करना चाहिए

इसका फल यजमान को कुछ नहीं मिलता और विद्वान को नष्ट कर देता है

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सम्मानित विद्वानों को अपने द्वारा बनाए गए मंत्र और आरती का प्रयोग क्यों नहीं करना चाहिए विद्वानों को अपने द्वारा बनाई गई मंत्र और आरती का प्रयोग करने से यजमान को फल नहीं मिलता पुराणों में तो यही आता है जो पुराणों में साक्ष्य के रूप में पाया जाता है

हिंदू धर्मशास्त्रों और तंत्र शास्त्रों के अनुसार, विद्वानों या साधकों को अपने द्वारा बनाए गए मंत्रों और आरती का प्रयोग करने से बचने की सलाह दी जाती है। इसके प्रमुख कारण और शास्त्रीय आधार निम्नलिखित हैं:
१. मंत्र ‘द्रष्टा’ होते हैं, ‘रचयिता’ नहीं:
शास्त्रों के अनुसार, मंत्रों की रचना नहीं की जाती, अपितु ऋषियों ने उच्च ध्यान अवस्था में उनका दर्शन किया है। वे मंत्र ‘सिद्ध’ और ऊर्जावान होते हैं। स्वयं रचित मंत्रों में वह आध्यात्मिक शक्ति या “नाद ऊर्जा” नहीं होती जो प्राचीन वेदमंत्रों या ऋषियों द्वारा रचित मंत्रों में होती है।
२. दोषपूर्ण उच्चारण और ऊर्जा का असंतुलन:
मंत्र एक प्रकार की ध्वनि विज्ञान हैं। वेदों के मंत्रों का उच्चारण, लय और कंपन निश्चित होता है। यदि मंत्र सही ढंग से न बने हों या उच्चारण में सूक्ष्म अंतर हो, तो वे लाभ के बजाय नुकसान पहुँचा सकते हैं और शारीरिक/मानसिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं।
३. तंत्र शास्त्र के अनुसार:
तांत्रिक ग्रंथों में मंत्रों की दीक्षा पर जोर दिया जाता है। स्वयं रचित मंत्रों में ‘शापोद्धार’ (शाप से मुक्ति) और ‘उत्कीलन’ (मंत्र को जागृत करना) की शक्ति नहीं होती। इसके बिना, वे मंत्र बेअसर हो सकते हैं या गलत दिशा में जा सकते हैं।
४. शास्त्र का प्रमाण:
भविष्य पुराण (उत्तर पर्व १२२/९) में कहा गया है: “वृथा जाप्यम अवैदिकम” अर्थात जो मंत्र वेदों या शास्त्रों के अनुसार नहीं हैं (अवैदिक), उनका जप व्यर्थ है।
तुलसीवनम (सांस्कृतिक अध्ययनों के अनुसार) का कहना है कि मंत्र ‘परमाणु बम’ की तरह शक्तिशाली होते हैं और सही मार्गदर्शन या शास्त्रीय आधार के बिना उपयोग करने पर वे स्वास्थ्य, मन और सामाजिक जीवन को नष्ट कर सकते हैं।
५. आरती के विषय में:
आरती के लिए भी पद्म पुराण में निश्चित पाँच अंग बताए गए हैं। विद्वानों का मानना है कि जो आरती परंपरा से चली आ रही है, उसमें सामूहिकता और भाव की शक्ति है, जो व्यक्ति विशेष की रची आरती में नहीं मिल सकती।
निष्कर्ष:
शास्त्रों का कथन है कि विद्वान को अपनी “अहंकारी बौद्धिकता” से बचकर, प्रमाणित और ऋषियों द्वारा प्राप्त मंत्रों का ही सहारा लेना चाहिए।


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